Friday, 22 February 2013

‘संवैधानिक अधिकार बचाओ’


     यह सम्भव है कि संसार में जो बड़ी-बड़ी ताकतें साम्राज्यवादी, पृथकतावादी एवं शोषणवादी मनोवृतियों से काम कर रही है, उन्हें हम पूरी तरह से चाहे न समझ सके किन्तु इतना तो हमें समझना चाहिए कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का प्रयोजन तथा मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा का क्या औचित्य रहा। इसी तरह स्वाधीनता का लक्ष्य प्राप्त करके भारतीय आजादी के नेताओं ने भारत की जनता को किन मौलिक अधिकारों की रक्षा का वचन दिया। हालांकि सार्वभौमिक अधिकारों तथा मूलभूत अधिकारों की प्राप्ति ही हमारा लक्ष्य नहीं है बल्कि भारत की राजनैतिक शासन व्यवस्था तथा संयुक्त राष्ट्र संघ का न्यायपूर्ण संचालन भी विश्व शान्ति में सहायक बने, यह भी हम सबका संवैधानिक अधिकार है। प्रत्येक नागरिक के संवैधानिक अधिकार सुरक्षित होते है तो राजनैतिक बिखराव, सामाजिक वैमनस्यता व आर्थिक असमानता के संकट से छुटकारा प्राप्त होगा, साथ ही नागरिक अधिकारों का विनाश करने वाली तानाशाही शासन व्यवस्था व जन आन्दोलनों के माध्यम से जनता को हिंसक बनाने के कूटनीतिक प्रयासों पर भी अंकुश लगेगा।
     आप लोग मेरी बात पर विश्वास कीजिये या मत कीजिये, परन्तु यदि आप देश-दुनिया के वर्तमान द्वंद्व, संघर्ष, कोलाहल, अशान्ति व वर्गयुद्ध का हल तथा विश्व जीवन को दुरस्त रखना चाहते है तो मेरे द्वारा प्रारम्भ किये गये एकमात्र सार्थक और समयोचित प्रयास ‘संवैधानिक अधिकार बचाओ’ आन्दोेलन को समर्थन दीजिये।

Monday, 18 February 2013

मुस्लिम अधिकार, हिन्दु अधिकार और महिला अधिकार के मतवाद देश के लिए घातक है। अपनी-अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर प्रत्येक मनुष्य के उत्थान की बात करो।

भारत के गौरव को बढ़ाने का प्रयत्न करो। भारत को नया व सुन्दर भारत बनाओं। इसे इंग्लिस्तान या हिन्दू राष्ट्र बनाने के निरर्थक प्रयास मत करो।

विश्व हिन्दु परिषद के अन्तर्राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. प्रवीण भाई तोगडिया हिन्दु समाज को हिन्दु राष्ट्र बनाने का संकल्प दिलाते समय यह क्यों भूल जाते है कि आज तो हिन्दी, हिन्दु और राष्ट्र तीनों ही संकट में है। उन्हें पहले हिन्दी, हिन्दु और राष्ट्र पर चिन्तन करना चाहिए, बाकी सब बातें निरर्थक है।

सुन्दर विचार


      सुन्दर विचार

कांग्रेस ने धर्म निरपेक्ष भाव को धर्म विमुख भाव तथा भाजपा ने भारतीय संस्कृति को वोट (हिन्दु) संस्कृति बना दिया। कांग्रेस और भाजपा अपने-अपने आदर्श अपनाकर स्वयं का व देश का भला करें।

                                                                                            (श्याम बनवाड़ी)
                                                                                       राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष
                                                                                    भारतीय यूनेस्को क्लब महासंघ

Tuesday, 1 January 2013

खण्डेलवाल सेवक के सम्पादक का अपमान पूरे समाज का अपमान


     देश के प्रमुख पत्रकार श्याम बनवाड़ी ने अमरावती से प्रकाशित खण्डेलवाल सेवक के सम्पादक श्री हुकमीचन्द खण्डेलवाल के साथ खण्डेलवाल वैश्य समाज के राष्ट्रीय अधिवेशन में किये गये अशिष्ट व्यवहार की खुले शब्दों में निन्दा करते हुए अपने बयान में कहा है कि धन और पद के मद में चूर होकर समाज के पदाधिकारियों द्वारा किया गया कृत्य फासीवादी तानाशाही का प्रतीक हैं। इसी तरह खण्डेलवाल परिवार के सम्पादक के विरूद्ध की गयी टिप्पणी भी निन्दनीय है। खण्डेलवाल सेवक के सम्पादक को सम्मैलन स्थल से बाहर निकालना तथा वापस अन्दर नहीं आने देने सम्बन्धी विचार पूरे समाज को अपमानित किये जाने जैसा है। बनवाड़ी का मानना है कि खण्डेलवाल समाज के सभी स्वाभिमानी बन्धुओं द्वारा इसकी निन्दा करना चाहिए।

Monday, 31 December 2012

बाजारवाद से प्रभावित सामाजिक संगठन



     पूरी दुनिया में पूंजीवादी व्यवस्था ने आम आदमी में एसी भौतिकवादी मनोवृति उत्पन्न कर दी है कि किसी भी समाज में केवल उन्हीं व्यक्तियों को प्रतिष्ठा प्राप्त होती है जो धनी है। इस मनोवृति से धनी वर्ग में साम्राज्यवादी राजनीति का प्रादुर्भाव हो गया। पिछले कुछ वर्षो से धन के बल पर सामाजिक पद प्रतिष्ठा प्राप्त करने की होड़ मची हुई है। देश-दुनिया में उपस्थित इस वातावरण से खण्डेलवाल वैश्य समाज भी कैसे अछूता रह सकता है। इसका असर खण्डेलवाल वैश्य महासभा के हाल ही ग्वालियर में हुए अधिवेशन में देखने को मिला। जाति की इस महापंचायत में महासभा के सारे पवित्र उद्देश्य बाजारवाद की भेंट चढ़ा दिये गये। तीन दिवसीय अधिवेशन में कार्यकारिणी के सदस्य से लेकर संरक्षक पद तक की निलामी के अलावा कोई कार्य नहीं हुआ। जिस बन्धु में जितनी ज्यादा निवेश की क्षमता रही उसने उसके अनुकूल पद प्राप्त किया। देखा जाय तो महासभा के एक सौ वर्षो के गौरवमय इतिहास को ग्वालियर में कलंकित कर दिया गया।
     खण्डेलवाल वैश्य महासभा का एक सौ वर्षों का अतीत इतना उज्वल और महान रहा है कि समाज के आम बन्धु ने अपने सामर्थ्य के अनुसार सदैव भागीदारी निभाई। किसी भी बच्चे को अर्थाभाव के कारण शिक्षा से वंचित नहीं होने दिया और न ही किसी विधवा नारी को गुजारे के लिए भटकने को विवश होना पड़ा। वैसे भी असहाय व्यक्ति की सहायता के लिए उठ खड़ा होना पूरे समाज का सामुहिक दायित्व होता है। यदि कोई समाज विधवाओं के आंसू पोंछने का दायित्व नहीं निभा सकता तथा कुछ अभावग्रस्त बच्चों को शिक्षा नहीं दे सकता वह पूरा समाज अमानुषिक कृत्य का भागीदार बनता है तथा समाज का संगठन महत्वहीन बन जाता है।
     ग्वालियर में चन्द धनी व्यक्तियों द्वारा महासभा के उद्देश्यों को पूरा करने का दम्भ प्रदर्शित करने तथा संगठन पर कब्जा करने की मानसिकता से सेवा की भावना को जबरदस्त ठेस पहुंची है। इस पाखण्डी रूप के प्रति समाज के आम जन की सहमति व विनम्रता के भाव से किसी भी जाति की स्थिति दिनो दिन छीजती है, उसकी कमजोरी बढ़ती है। परिणाम यह होता है कि उनकी रचनात्मक कलाओं और प्रवृतियों का क्षय हो जाता है तथा पूरी जाति मानसिक दृष्टि से धनी वर्ग की गुलाम हो जाती है। समाज में आम बन्धु की भागीदारी न्यून होती जा रही है। गत कुछ वर्षों से खण्डेलवाल वैश्य महासभा के संचालन का जिम्मा कुछ लोगों ने कैन्द्रित कर लिया है जिसके खतरे अधिक है।
     ग्वालियर सम्मेलन में जयपुर की खण्डेलवाल वैश्य हितकारिणी सभा के विवाद और गंगा मन्दिर से हितकारिणी सभा का आधिपत्य समाप्त करने के लिए बाहुबल के उपयोग की धमकी देना तथा समाज के पत्रों में महासभा के पदाधिकारियों के विरूद्ध छापने वालों को मंच द्वारा चुनौती देना व सम्मैलन स्थल के बाहर निकालना घटिया मानसिकता व अहंकार का प्रदर्शन है।
     एसी मानसिकता के कारण ही गत कुछ वर्षों में समाज में मुकदमेबाजी, कुर्सी रेस व टांग खिचाई और क्लेश बढ़े है जिसमें समाज गुटबाजी का शिकार हुआ है। इस प्रक्रिया से हम समाज की भावी पीढ़ी को शान्ति, सद्भाव व सदाचार तो नही दे पायेंगे, यह मेरा दृढ़ विश्वास है।
     धनी वर्ग की इस तरह की मानसिकता के कारण ही स्वामी विवेकानन्द जैसे संत में भी धनिक वर्ग के प्रति कभी आदर भाव नहीं रहा। वे कहते थे कि ऊंची श्रेणी के लोग तो शरीर और नैतिकता दौनों ही दृष्टियों से मर चुके है। एसे लोगों के सामने याचक बनकर व्यक्ति अपना व समाज दौनों का अपमान करता है।
     वैसे भी संसार में बौद्धिक क्षमता की दृष्टि से खण्डेलवाल समाज के सांस्कृतिक गुरू सन्त कवि सुन्दरदास एसी विरासत है जिसके विचारों में पूरी दुनिया को प्रभावित करने की ताकत है जिनके आध्यात्मिक विचारों और आदर्शो का प्रचार यदि देश-दुनिया में किया जाय तो संसार में एक नयी कल्पना, एक नए जीवन का सूत्रपात हो सकता है।
     मै जानता हूं कि मेरे इन विचारों से पूरा समाज रूष्ट होगा किन्तु गुलाम प्रथा व गुलाम मानसिकता से ग्रस्त हो रहे समाज बन्धुओं को सचेत करना मैं अपना दायित्व समझता हूं। उसी दायित्व के निर्वहन की दृष्टि से में खण्डेलवाल समाज को उसके गौरवशाली भविष्य की राह पर ले जाने के लिए संकल्पबद्ध रहूंगा।